Organisations and Department structure

Organisations Structure
संस्थागत स्वरूप

(1) शीर्ष सहकारी संस्थायें

  • उत्तराखण्ड राज्य सहकारी बैंक लि0, हल्द्वानी,
  • उत्तराखण्ड राज्य सहकारी संघ लि0 देहरादून,
  • उत्तराखण्ड कोआपरेटिव रेशम फेडरेशन लि0, प्रेमनगर, देहरादून,
  • उत्तराखण्ड राज्य आवास संघ लि0, देहरादून

(2) केन्द्रीय सहकारी संस्थाय

  • जिला सहकारी बैंक लि0- 10
  • जिला सहकारी बैंको की शाखाये- 235
  • जिला केन्द्रीय उपभोक्ता सहकारी भण्ड़ार लि0,- 06
  • जिला सहकारी संघ लि0 - 7
  • अन्य केन्द्रीय समितियां- 83

(3) ्रारम्भिक सहकारी समितियां

  • प्रारम्भिक कृषि ऋण सहकारी समितियां- 758
  • प्रारम्भिक उपभोक्ता सहकारी समितियां- 158
  • क्रय-विक्रय सहकारी समितियां,- 29
  • श्रम सहकारी समितियां- 494
  • वेतनभोगी सहकारी समितियां, - 326
  • नगरीय सहकारी बैंक- 06
  • परिवहन सहकारी समितियां- 34
  • बहुद्देश्यीय सहकारी समितियां- 58
  • कृषि सहकारी समितियां- 127
  • मुर्गीपालन सहकारी समिति- 10
  • सूअर पालन सहकारी समिति- 04
  • गृह निर्माण सहकारी समितियां- 99
  • तिलहन सहकारी समितियां- 51
  • औद्योगिक सहकारी समितियां- 431
  • औद्यानिक सहकारी समितियां, - 34
  • मत्स्य सहकारी समितियां- 17
  • रेशम सहकारी समितियां,- 106
  • पशु शव विच्छेन - 26
  • अन्य सहकारी समितियां,- 214

(4) स्वायत्त सहकारिताय

  • उत्तराखण्ड स्वायत्त सहकारिता अधिनियम 2003 के अन्तर्गत माह- फरवरी 2013 तक कुल 1042 सहकारिताओं का गठन किया जा चुका है।
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सहकारिता का संक्षित इतिहास

वर्ष 1904 में सहकारिता ऋण समिति अधिनियम बनाकर सहकारिता के माध्यम से आसान शर्ताे पर कर्ज दिलवानें की शुरूआत की गयी जो भारतवर्ष में सहकारिता के क्षेत्र में पहला कदम था। इस अधिनियम के अन्तर्गत प्रारम्भ में केवल दो प्रकार (शहरी क्षेत्रों एंव ग्रामीण क्षेत्रों) की समितियों का गठन प्रारम्भ किया गया । इस अधिनियम के पारित होते ही इसके प्राविधानों को त्वरित गति के साथ लागू करते हुए विभिन्न प्रान्तीय सरकारों द्वारा रजिस्ट्रार नियुक्त किये गये और सहकारिता के सम्बन्ध में प्रभावी कार्यक्रम लागू किये गयेे, जिससे आगामी वर्षो में सहकारिता के क्षेत्र में आशातीत प्रगति हुई। तत्पश्चात सहकारिता के कार्यक्षेत्र को और अधिक व्यापक बनाये जाने की दृष्टि से वर्ष 1912 में नया सहकारी अधिनियम बनाया गया । इस अधिनियम में शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में गठित की जाने वाली समितियों के अन्तर को समाप्त कर दिया गया तथा सहकारिता आन्दोलन के प्रसार को समुचित संरक्षण भी मिल गया एंव ऋण देनें के अतिरिक्त अन्य उद्देश्यों के लिए भी सहकारी समितियों का गठन सम्भव हो सका । सहकारी आन्दोलन में बहुमुखी प्रसार को दृष्टिगत रखते हुए वर्ष 1965 में उ0प्र0 में नये सहकारी अधिनियम का गठन किया गया। जो वर्ष 2003 तक उत्तराखण्ड़ राज्य में भी समान्तर रूप से लागू रहा।

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